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Coronavirus : जानिए कैसे काम करती है ऑक्सफोर्ड की Vaccine और क्या हैं उसके साइड इफेक्ट्स?

नई दिल्ली। कोरोना वायरस का संक्रमण दुनियाभ्र में तेजी से फैल रहा है। इस बीच इस वायरस ने दुनियाभर के 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। जब तक वैक्सीन नहीं आ जाती, तब तक कोरोना वायरस का कहर रुकने वाला नहीं है। इस बीच ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक राहत भरी खबर दी है। जहां वैक्सीन का ट्रायल करीब-करीब सफल बताया जा रहा है। जिसमें कम से कम 1000 लोग शामिल हुए थे। अब बड़े पैमाने पर लोगों को इसे देकर इसके बारे में और ज्यादा अध्ययन किया जा रहा है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग आधार 

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन को एजेडडी1222 नाम दिया गया है। ये चीन के कैनसिनो बायोलॉजिस्ट और अमेरिका की जॉनसन एंड जॉनसन की ओर से तैयार वैक्सीन की तरह ही है। इसको भी जेनेटिक इंजीनियरिंग के आधार पर तैयार किया गया है। जिसकी मदद से इंसानों की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत किया जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन साधारण सर्दी के वायरस एडिनोवायरस यानी कमजोर वायरस पर आधारित है। इसको चिपैंजियों से आए एडिनोवायरस से लिया गया है। बाद में जेनेटिक इंजानियरिंग की मदद से इसमें बदलाव किया जाता है। जिससे इंसानों के शरीर में इसकी प्रतिकृति नहीं बनती है।

क्या हैं साइड इफेक्ट्स?

ऐसा कहा जाता है कि दुनिया में हर दवा का कुछ न कुछ साइड इफेक्ट तो रहता ही है। भले ही वो नुकसान पहुंचाने लायक न हो। कुछ ऐसा कोरोना वायरस वैक्सीन के साथ भी है। वैक्सीन देने के बाद लगभग 60 प्रतिशत वॉलंटियर्स में बुखार, सिर और मांसपेशियों में दर्द की समस्या देखी गई, लेकिन ये समस्या बेहद ही कम थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक इतना साइड इफेक्ट आम बात है। वैक्सीन के कोई गंभीर साइड इफेक्ट ट्रायल के दौरान सामने नहीं आए हैं।

एंटीबॉडी में चार गुना वृद्धि

जब जेनेटिक इंजीनियरिंग पर आधारित ChAdOx1 को स्पाइक प्रोटीन के साथ किसी व्यक्ति को दिया जाता है, तो यह स्पाइक प्रोटीन के निर्माण का कारण बनता है। इसके बाद शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इसे पहचानती है और बाहर से आए वायरस को हराने के लिए एंटीबॉडी बनाना शुरू कर देती है। Lancet नामक पात्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक जिन्हें शुरू में वैक्सीन का शॉट दिया गया था, उनमें प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया बढ़ी है। वैक्सीन की एक खुराक देने के महीने भर बाद 95 फीसदी वॉलंटियर्स में SARS-CoV-2 वायरस स्पाइक के खिलाफ एंटीबॉडी में चार गुना की वृद्धि दर्ज की गई। टी-सेल प्रतिक्रिया एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका है, जो कोरोना वायरस पर हमला करती है।

कब आएगी वैक्सीन?

ब्रिटेन में तीसरे चरण का ट्रायल जारी है। इसके अलावा अफ्रीका और अन्य देशों में भी बड़े पैमाने पर ट्रायल किया जा रहा है। ट्रायल सफल रहने पर इसकी रिपोर्ट के साथ रजिस्ट्रेशन करवाया जाएगा। जिस वजह से इस साल के अंत तक वैक्सीन बाजार में आने की उम्मीद है। पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मुताबिक दिसंबर तक वैक्सीन के 30-40 करोड़ डोज बना लिए जाएंगे। जिसमें से आधा भारत और आधा विदेशों में भेजे जाने का करार हुआ है।

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