छत्तीसगढ़

रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, राजनांदगांव, सरगुजा सहित छत्तीसगढ़ के 16 प्रमुख जिलों में ‘कर्ज़ नहीं-कैश दो’ नारे के साथ मजदूर-किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन

रायपुर। मजदूर-किसान संगठनों के देशव्यापी आह्वान पर 23 जुलाई 2020 को छत्तीसगढ़ बिलासपुर, रायपुर, राजनांदगांव, बस्तर, धमतरी, दुर्ग, कोरबा, सरगुजा, बलरामपुर, महासमुंद, रायगढ़, चांपा-जांजगीर, सूरजपुर, कोरिया, मरवाही, गरियाबंद जिलों के अनेकों गांवों, मजदूर बस्तियों और उद्योगों में मजदूर-किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ वृहद स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित कर किसान व गांव विरोधी नीतियों को वापस लेने, गरीबों को खाद्यान्न और नकद राशि से मदद करने, कोयला व रेलवे सहित अन्य सार्वजनिक उद्योगों के निजीकरण पर रोक लगाने, मनरेगा में 200 दिन काम और 600 रुपए रोजी देने सहित अन्य आदेशों को वापस लेने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को सार्वभौमिक बनाने, सभी लोगों का कोरोना टेस्ट किए जाने की मांग जोर-शोर से उठाया।

छत्तीसगढ़ किसान सभा (CGKS) के राज्य अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने बताया कि छत्तीसगढ़ में ये विरोध प्रदर्शन सीटू, छत्तीसगढ़ किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा के आह्वान पर “कर्ज़ नहीं, कैश दो” और “हम देश नहीं बिकने देंगे” के नारे के साथ घरों से खेतों और गांव की गलियों में, मजदूर बस्तियों और फैक्ट्री गेटों पर सैकड़ों स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन किया गया। संगठन के नेताओं ने स्थानीय स्तर पर आंदोलनरत किसानों और मजदूरों के समूहों को भी संबोधित किया और केंद्र सरकार द्वारा घोषित पैकेज को किसानों, ग्रामीण गरीबों और मजदूरों के साथ धोखाधड़ी बताया।

किसान नेताओं ने कर्ज़ के बदले किसान और प्रवासी मजदूरों को कैश से मदद करने की मांग पर जोर देते हुए ग्रामीण परिवारों को अगले 6 माह तक 7500 रुपए की मासिक नकद मदद देने, जरूरतमंद व्यक्ति को अगले 6 माह तक 10 किलो खाद्यान्न हर माह मुफ्त देने, किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सी-2 लागत मूल्य का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में देने, किसानों को बैंकिंग और साहूकारी कर्ज़ के जंजाल से मुक्त करने के साथ ही आदिवासियों और स्थानीय समुदायों को जल-जंगल-जमीन का अधिकार देने की मांग की।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम को समाप्त कर सारे प्रतिबंध हटाने का नतीजा तेजी से बढ़ती महंगाई, जमाखोरी, कालाबाजारी और खाद्यान्न असुरक्षा के रूप में देश को भुगतना पड़ रहा है। किसान नेताओं ने सभी प्रवासी मजदूरों को एक अलग परिवार मानकर काम और मुफ्त राशन देने की मांग की है तथा इसके लिए बजट में अतिरिक्त आबंटन की भी मांग की है। हाल ही में जारी कृषि संबंधी तीन अध्यादेश खेती-किसानी को बर्बाद करने वाले, किसानों को कार्पोरेटों का गुलाम बनाने वाले तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त करने वाले अध्यादेश हैं, जिन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।

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