मेरी रचना

मजदूर कब तक होंगे मजबूर …

सब कुछ खत्म हो गया है। ये कोरोना की बीमारी तो मौत से भी बदतर आई है। हमारी जजिंदगी में। हम अपने बिहार जा रहे हैं, वो भी पैदल। क्योंकि किसी ने हमें न तो गांव जाने के लिए कोई मदद की और न ही फैक्ट्री मालिक ने हमारी पूरी मजदूरी दी। यहां यहां रूक के भी क्या करते सबकुछ तो बंद हो गया है। जिस कमरे में रूके वो किराया मांग रहा था। किराने की दुकान वाले ने उधार देना बंद कर दिया। एक दो दिन पड़ोस से मांगकर खाया। पड़ोस वालों की हालत भी इतनी अच्छी नहीं थी। दो दिन घर में भूखे पड़े रहे। हारकर सुबह-सुबह अपना थोड़ा बहुत सामान उठाकर पैदल निकल पड़े। और क्या करते यहां मरने से अच्छा तो अपने गांव जाकर मरें, ताकि कोई जला तो दे हमें।

मेरे दोनों जवान बेटे, उनकी बहुएं, दो छोटे बच्चे, बीमार पत्नी और मैं। छोटे बेटे की बहू तो सात महीने की गर्भवती भी है। आज हमें चलते-चलते तीसरा दिन हो गया है। मुझे नहीं पता हम हमारे गांव कब पहुंचेंगे कब नहीं या रास्ते में ही दम तोड़ देंगे। मेरे एक पैर की चप्पल टूटी हुई है तो मैंने एक धागे से बांधी हुई है। मेरी पत्नी की चप्पल तो एक दिन पहले ही टूट चुकी थी जो रास्ते में ही फेंकनी पड़ी थी। दूर-दूर तक यहां पानी ही नहीं दिख रहा, खाने की उम्मीद तो छोड ही दीजिए। हम परिवार के सदस्य बुरी तरह थक चुके हैं। मेरे दोनों पोते भूख से बिलख रहे हैं।

हमने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। सिवाए पानी। अब तो पानी भी खत्म हो चुका है। यहां खेत व छोट-छोटे जंगल दिखाई दे रहे हैं। मेरी पत्नी व बहुओं से नहीं चला जा रहा है। उनकी हालत देखकर आंखों में आंसू आ रहे हैं मगर क्या करूं रो भी नहीं सकता। अगर मैं रोया तो सभी टूट जाएंगे। बड़े बेटे ने जूते पहन रखे हैं, चलत-चलते जूतों में उनके पैर गल गए हैं। जूते फेंक भी तो नहीं सकते फिर जमीन भी तो बहुत गर्म है, चल नहीं पाएंगे। इन सबके गम कैसे देखूं, एक भयानक और खौफनाक मंजर है ये। मन में बार-बार यही खयाल आ रहा है क्या खतरनाक मंजर टलेगा या हम सब रास्ते में ही दम तोड़ देंगे। बार-बार मन में बेचैनी उठ रही है।

मैं सबसे थोड़ा आगे चल रहा था। चलते-चलते अचानक मेरी पत्नी जोर से चिल्लाई, मैं एकदम से सहम सा गया। मन में एकदम से घबराहट हुई, मैंने देखा मेरा छोटा बेटा बेहोया होकर जमीन पर गिर गया। मैने और मेरे बड़े बेटे ने उसे उठाकर पास में एक पेड़ की छांव में लेटाया। मेरी बहुएं व पत्नी जोर-जोर से रोने लगी। हमारे पास पानी भी खत्म हो चुका था।

हमारो पास एक छोटा से फोन भी था परन्तु बैटरी खत्म होने की वजह से वो बंद हो चुका था। जिसके कारण हम किसी को फोन भी नहीं कर पा रहे थे। वहां आसपास कहीं भी पानी नहीं था। सिर्फ सूखे खेत व जंगल दिखाई दे रहा था। सब जोर-जोर से रो रहे थे। मुझसे भी अब नहीं रूका गया और मेरी भी चीख निकल गई। हम वहां सब रोते रहे, करीब आधा घंटा बाद कुछ मजदूर वहां आए, उनको भी आगे जाना था। उनके पास थोड़ा पानी था। मैंने उनसे पानी लेकर बेटे के मुंह में डाला। करीब 10 मिनट के बाद बेटे को होश आया। सभी ने उसको गले लगा लिया और सब रोते रहे। अब शाम हो चुकी थी तो वहीं पर रात बिताने के लिए रूक गए और अगले दिन सुबह करीब 5 बजे फिर से अपने गांव के लिए चल पड़े।

©राजकुमार बोहत, हरियाणा

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