मेरी रचना

मैं मजदूर हूं …

मै मजदूर हूं …

मेंहनत, मजूरी करता हूं

थोड़ा और काम कर थोड़ा और काम कर

छुट्टी होने के बाद भी लोग घंटों

मुझसे काम करवाते हैं

मजदूरी मांगता हूं तो आज

शनिवार बोल लोग टालते हैं

दुकान वाले मुझसे हर दिन

अपना उधार मांगते

पूरी मजदूरी मुझे कोई नहीं देता

हर दिन बात मुझे ये ही खलती

कहीं मुझे समानता नहीं मिलती

लोगों के बंगले बनाता हूं

खुद एक कच्ची छत के नीचे रहता हूं

रुखी-सूखी खाकर सो जाता हूं

सुबह फिर मजदूरी करने चला जाता हूं

मै मजदूर हूं !

 

©राजकुमार बोहत, हरियाणा

 

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