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भारतीय रेल निजीकरण की पटरी पर : सरकार कर रही इसके ‘स्वरूप’ में बदलाव की तैयारी …

रेलवे के तमाम यूनियन इसके खिलाफ प्रदर्शन की तैयारी में

नई दिल्ली। भारतीय रेलवे ने पिछले हफ्ते तमाम जोन प्रबंधकों को पत्र लिखकर चौंका दिया। पत्र में नई भर्तियां नहीं करने और खाली पदों में 50 फीसदी की कटौती करने की बात कही गई थी। इस पर विवाद शुरू हुआ, तो रेलवे अपनी बात से मुकर गया। लेकिन, यह कोई नई और छिपी बात नहीं है कि भारतीय रेलवे अब ‘निजीकरण’ की पटरी पर दौड़ने की तैयारी कर रही है। दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेल नेटवर्क को पटरी पर लाने के लिए सरकार उसके स्वरूप में बदलाव की तैयारी कर रही है। इसके तहत हजारों पदों में कटौती करने के अलावा नई नियुक्तियों पर रोक लगाने और देश के कई रूट पर ट्रेनों को निजी हाथों में सौंपने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।

इस कवायद के चौतरफा विरोध के बीच रेलवे ने सफाई दी है कि सुरक्षा से जुड़े पदों में कोई कटौती नहीं की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र सरकार एक सोची-समझी रणनीति के तहत विदेशों की तर्ज पर रेलवे को निजी हाथों में सौंपने में जुटी है।

ऐसे में यह सवाल यह है कि इससे आम लोगों के हितों की रक्षा कहां तक हो सकेगी? इसकी वजह यह है कि देश की ज्यादातर आबादी के लिए भारतीय रेल जीवनरेखा की भूमिका निभाती रही है। निजी हाथों में जाने के बाद सुविधाओं की तुलना में किराए में असामान्य बढ़ोतरी तय मानी जा रही है। यही वजह है कि तमाम रेलवे कर्मचारी यूनियन इस फैसले के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं।

निजीकरण के पक्ष में सरकार और रेलवे की ओर से दी जा रही दलीलों में चाहे जितना दम हो इसका असर यात्री किराए पर पड़ना तय है। मिसाल के तौर पर दिल्ली से लखनऊ के बीच चलने वाली तेजस एक्सप्रेस का किराया इसी रूट पर चलने वाली राजधानी एक्सप्रेस से कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि इस फैसले का चौतरफा विरोध होने लगा है।

रेलवे भारत में सबसे ज्यादा लोगों को नौकरी देने वाला संस्थान है। फिलहाल, इसमें 12 लाख से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं, इसके कुल राजस्व का करीब 65 फीसदी हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर खर्च होता है

पिछले सप्ताह रेलवे ने तमाम जोन के महाप्रबंधकों को भेजे पत्र में कहा था कि वे नए पदों का सृजन रोक दें और खाली पदों में भी 50 प्रतिशत की कटौती करें, लेकिन इस पर पैदा होने वाले विवाद के बाद अगले दिन ही उसे इस पर सफाई देनी पड़ी। उसने अपनी सफाई में कहा है कि आने वाले दिनों में उसके कुछ कर्मचारियों की जॉब प्रोफाइल में बदलाव हो सकता है, लेकिन उनकी नौकरियां नहीं जाएंगी।

रेलवे बोर्ड के महानिदेशक आनंद एस खाती का कहना था, “भारतीय रेल कर्मचारियों की मौजूदा तादाद में कटौती नहीं कर रही है। नई तकनीक आने की वजह से कुछ लोगों का काम बदल सकता है। इसके लिए उनको ट्रेनिंग भी दी जाएगी, लेकिन किसी भी कर्मचारी की नौकरी नहीं जाएगी। भारतीय रेल बिना कौशल वाली नौकरियों की ओर जा रही है। सही व्यक्ति को सही काम दिया जाएगा।”

खाली पदों में कटौती और नई भर्तियां रोकने के फैसले के साथ ही रेलवे ने अब निजीकरण की राह पर भी ठोस कदम बढ़ा दिया है। हालांकि तेजस जैसी ट्रेनों के साथ वह इसकी शुरुआत पहले ही कर चुकी है, लेकिन अब देश के 109 रूटों पर 151 ट्रेनों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है।

यह काम 2023 से शुरू होगा और संबंधित कंपनियों को 35 साल के लिए संचालन का जिम्मा सौंपा जाएगा। इसके ऐलान के साथ ही टाटा और अडानी समूह जैसे कई व्यापारिक घराने इसमें दिलचस्पी दिखाने लगे हैं।

संचालन के लिए चुनी जाने वाली कंपनियों को रेलवे को विभिन्न मद में एक निश्चित रकम देनी होगी। इसके लिए निजी क्षेत्र को 30 हजार करोड़ रुपए का निवेश करना होगा।

निजीकरण करने के पीछे रेलवे की दलील है कि इससे रेलवे में नई तकनीक आएगी, मरम्मत औऱ रख-रखाव का खर्च कम होगा, ट्रेन के यात्रा का समय घटेगा, रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराई जा सकेंगी। फिलहाल रेलवे 2800 मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों का संचालन करती है।

आजादी के बाद से ही तमाम सरकारें अब तक रेलवे का संचालन सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर करती रही हैं। इसके लिए किराए में भारी-भरकम सब्सिडी दी जाती है। वैसे, बड़े पैमाने पर ट्रेनों के निजीकरण की योजना के संकेत तो कुछ समय पहले से ही मिलने लगे थे, जब अचानक हर टिकट पर छपने लगा कि किराए में सरकारी सब्सिडी 43 फीसदी है। इस सब्सिडी की वजह से सरकार को सालाना 30 हजार करोड़ का नुकसान होता है।

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