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मूलनिवासी श्रमण प्राकृतिक त्यौहार, एक प्राचीन स्वास्थ्य महाअभियान …

मूलनिवासी कोइतुर कुसरी पंडुम/हरेली पंडुम (आधुनिक हरेली)  के विशेष सन्दर्भ में

भरतीय श्रमण, कोइतुर मूलनिवासी लोक परंपरा के संदर्भ में पर्व पावनता का, उत्सव उमंग का त्यौहार त्याग,  तितिक्षा और तत्परता का प्रतीक रहा है। भातीय सामाजिक व्यवस्था में श्रम,  साहस, त्याग, कुशलता,  मेंहनत और पुरुषार्थ पर आधारित श्रमण सम्यक सौम्य संस्कृति ही आदि मूलनिवासी संस्कृति रही है। इसी कारण भारत के सभी पर्व प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण, लोक स्वास्थ्य,  कृषक,  श्रमण संस्कृति से जुड़ी है। मूलत: हरेली का त्यौहार प्रकृति कृषक व्यवस्था,  पशुओं के प्रति प्रेम भाव, सहकार और सम्मान का पर्व है।

इस पर्व को धर्म, भक्ति, श्रद्धा,  समर्पण और भावना से इसीलिए जोड़ा जाता है ताकि प्रकृति के इस योगदान को सहकारी भाव,  स्वरूप रूप से मानव समाज जुड़े और उसकी अमूल्य धरोहरों को समझे। जिनसे आदमी का जीवन और अस्तित्व है। जैसा की मालूम है अदिमानव का जीवन अनेक समस्याओं,  कष्टों और विपदाओं से भरा हुआ था। वह भाग-दौड़ की जिंदगी में दिन-रात समस्याओं-कष्टो और पीड़ा का समाधान ढूंढने में जुटा रहता था । ताकि उसके मानवीय अस्तित्व की रक्षा हो सके। इसी आशा और निराशा के क्षणों में उसका मन व्याकुल दु:खमय बना रहता है। इस विविधतावादी समस्याओं का मनोवैज्ञानिक समाधान के रूप में मूलनिवासी समाज ने पर्व, उत्सव और त्यौहार का अबलम्बन प्राप्त किया। जिस मूलनिवासी सामाजिक व्यवस्था में ऐसे ही क्षणों में हरेली जैसे पर्व जीवन में हरियाली के रूप में खुशियों और आशा का संचार करते हैं।

हरेली का ऐतिहासिक सन्दर्भ और परिचय

हरेली एक सुपरिचित नाम है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है कि वैसा त्यौहार और पर्व जो प्रकृति में हरियाली, हरितिमा के रूप में मानव समाज में खुशियों का सम्वर्धन करती है, हरेली कहलाता है।

यह मूलतः कृषकों,  किसानों का त्यौहार है। जिसे वह अपने दवारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले हल,  बैल,  कुदाल फावड़ा और तरह-तरह के औजार जो खेती-बड़ी में काम आते हैं कि पूजा और प्रतीकात्मक सम्मान भी करते हैं। जैसा कि मालूम है मूलनिवासी समाज प्रकृति पर आधारित जीवन व्यवस्था थी। जिसमें समाज गण व्यवस्था (टोटेम एंड TABBO) पर आधारित होते थे। हरेक गण का एक विशेष गणचिन्ह (टोटेम) के रूप में पशु, पक्षी और पेड़ होते थे, जिसका संरक्षण, संवर्धन और सम्मान उस गण के लोगों की नैतिक जिम्मेदारी होती थी। जिनका वैवाहिक संबंध भी एक समान गनचिन्ह के लोगों के साथ न होकर विषम गणचिन्ह के लोगों के साथ हुआ करता था। जिससे बेहतर सामाजिक, सामरिक, प्रशासनिक संबंध,  सुरक्षा के साथ उन्नत संतति का भी जन्म और विकास होता था।

क्योंकि भारतीय मूलनिवासी श्रमण परंपरा में प्रकृति आधारित जीवन व्यवस्था में कृषि और पशुपालन ही एकमात्र जीविकोपार्जन का स्थाई साधन रहा है। अतः मानव समाज जिस उपकरणों और पशुओं की मदद और सहायता से कृषि कार्य करता था उसे भी जीवन और परिवार का एक महत्वपूर्ण अंग मानता था। जिस कारण उसके प्रति श्रद्धा सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करना मानव समाज अपना नैतिक और सामाजिक कर्तव्य मानता था।

हरेली अर्थात हरियाली ये छत्तीसगढ़ का लोक पर्व है। प्रेम, खुशहाली और हरियाली का ये त्यौहार श्रावन अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन कृषि यंत्रों की पूजा की जाती है और किसान काम पर नहीँ जाते। एक अंधविश्वास भी इस त्यौहार से जुड़ा है, जिसके अनुसार माना जाता है कि नकारात्मक शक्तियां इस दिन सक्रिय हो जातीं हैं और इन्हें रोकने के लिए प्रवेश द्वार पर नीम की डंगाल को पत्तियों सहित लगाया जाता है ।

भारत में सिर्फ “हरेली” ही ऐसा त्यौहार जो हरियाली का प्रतीक है। जिसे पूरे छत्तीसगढ अंचल के गांव-गांव में बड़े ही उत्साह पूर्वक  से धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार मूलनिवासी बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। हरेली श्रावण मास में आने वाला त्यौहार है। उत्तराखंड में यही त्यौहार हराला के नाम से,  बिहार में गांव खुटना (गांव  पूंजा, गोसाई पूजा) के नाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर बिहार में कहीं-कहीं मुर्गे, कबूतर और बकरे की बलि देने की भी परम्परा है । इसअवसर पर भैस व बैलों को नमक और बगरंडा की पत्ती भी खिलाई जाती है ताकि वह ऋतु संक्रमण काल में जीवाणु-विषाणुओं व किटाणुओं के प्रकोप के कारण मौसमी बीमारियों जैसे अपच,  पेचिस,  अम्लता गैस्त्रीक आदि से बचे रहें।  इस दिन मूलनिवासी द्वारा अपने गनचिन्ह, कुलदेवता की भी पूजा करने की परंपरा है। हरेली पर किसान नागर,  गैंती,  कुदाली,  फावड़ा समेंत कृषि के काम आने वाले सभी तरह के औजारों की साफ-सफाई कर उन्हें एक स्थान पर रखते है और इसकी पूजा-अर्चना करते है। इस अवसर पर सभी घरों में गुड़ का मीठा चीला भी बनाया जाता है। ।

इस दिन यादव समाज के लोगों को भी स्वेच्छा से चावल-दाल, सब्जी और अन्य उपहार दिए जाते हैं। जो सामाजिक एकता, समता-समानता और सद्भाव का प्रतिक है। इसके अलावा कुलदेवता और ग्राम देवता के सामने बलि भी यादव समाज के द्वारा ही दिलाई जाती है।

इस दिन बैल,  भैंस और गाय को बीमारी से बचाने के लिए बगरंडा और नमक खिलाने की परंपरा है। अतः गांव में यादव समाज के लोग सुबह से ही सभी घरों में जाकर गाय,  बैल और भैंसों को नमक और बगरंडा की पत्ती खिलाते हैं। सुबह के समय और अपने साथ थाली में चावल, मिर्च, नमक चरवाहे के लिए ले जाते हैं। उसी के साथ गुथा हुआ आटा और खम्हार की पत्ती लेकर जाते हैं। उस गुथे हुए आटे की गोली बनाकर खम्हार की पत्ती (पानपत्र) के बीच रख हल्का बांध देते हैं फिर गाय,  बैल, भैंस को खिलाते हैं।

 मूलनिवासी हरेली पंडुम और स्वास्थ्य विज्ञान -एक विश्लेषण 

मानोवविज्ञान वादियों और इंडोलॉजिस्ट के अनुसार मूलनिवासी श्रमण समुदाय मूलतः पहले सरल, विनम्र, अशिक्षित समाज था। जो मूलतः प्रकृति पर निर्भर होता था। अतः अपने अस्तित्व के लिए वह प्रकृति की घटनाओं को ही दैवीय प्रकोप मानकर उसके अनुरूप व्यवहार और मनोवैज्ञानिक व  सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया।

पत्तीदार भाजियों के उपभोग पर प्रतिबंध

मूलनिवासी कोइतुर परंपरा में कृषि विकास क्रम में वर्ष की पहली पर्व “कुसरीपंडुम” (भाजी जोगनी) कहा जाता है। जिसमें ( चरोटाभाजी, जिर्रा भाजी,  दोबा,  चेच भाजी इत्यादि!) का विशेष महत्व होता है। हरेली पंडुम पर्व को मानव वैज्ञानिकता की प्रथम सीढ़ी कहा जाता है। कोयतोरीन्स तकीनीक में “कुसरी पंडुम” का तात्पर्य उस विज्ञान से है, जो “किसी फल, फूल व वनस्पति के पूर्णपरिपक्वता को परिभाषित करता है। वनस्पति विज्ञान के दृष्टिकोण से वर्षा ऋतु के आगमन उपरांत समस्त जीव, वनस्पति क्रियाशील हो जाते है। अर्थात समस्त वनस्पति की अंकुरण तीव्र गति से होता है। जोकि मृदा में उपस्थित खनिज लवण लवण जैसे  (कैल्शियम, सल्फर, मैग्नीशियम, जिंक, बोरोन….. इत्यादि।) को पौधों के शीर्ष भाग पर संरक्षित व पौधवृद्धि,  विकास को नियंत्रित करता है। जिससे पौधे के शीर्ष पत्तियों में खनिज लवण/तत्व की सान्द्रता अधिक हो जाती है। जिसके कारण उनके उपभोक्ता मानव अपितु वन्य व पाल्यपशुओं के पाचनतंत्र को असन्तुलित व प्रभावित करता है।

इसलिए हमारे जागरूक पूर्वजों ने “सावन साग नहीं भादो दही” ग्रामीण परिवेश में कहावत प्रचलित करके उन भाजियों, सागों, पत्तीदार भाजियों पर तब तक खाने ले लिए प्रतिबंध लगाया जब तक उच्चस्तरीय तत्त्वों की रासायनिक सान्द्रता कम ना हो जाए। अर्थात पौधे- पत्तियों में से खनिज तत्त्वों की मात्रा कम न हो जाए। ताकि जिसको उपयोग में लाया जा सके जिससे पाचनतंत्र प्रभावित न हो। और नाही संक्रमित हो। न रोग उत्पन्न हो सके।

दूसरा कारक (फैक्टर) वर्षा ऋतु अग्मनुप्रान्त वनस्पतियों के साथ-साथ फंगस,  बैक्टेरिया,  वायरस व कोट, पतंग) तीव्रगति से क्रियाशील हो जाते हैं जो कि कोया के साथ-साथ पशुओं पर रोगउत्पन्न (दस्त, खुर पका-मुंह पका आदि) कर हानि पहुंचाती है। जानवरों को इस रोग से बचाने के लिए जीभ पर नमक रगड़ा जाता है। अतः इन सब को ध्यान में रखते हुए हमारे ‘महावैज्ञानिक’ पूर्वजों ने “कुसरी पंडुम” हरेली जैसे महान महापर्व “परम्परा” का निर्माण किया। जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित हो सके। आज भी समस्त कोयतोरीन्स समुदाय के जरे जरे में (डीएनए) में सतत संस्कार, संस्कृति, मान्यता और परंपरा के रूप में संचालित हो रहा है।

सतही जिवाणुओं, फंगस से बचाव हेतु गेंड़ी का प्रचलन

इस सावन के मौसम में जीवों की क्रियाशीलता को नियंत्रित करने के लिए परावैज्ञानिक पूर्वजों ने “पंडुम” के दिन “डिटोंग” (दीपादिय) “गोरोन्दी”/ गेड़ी (लकड़ी का दो पैरों से बना ऐसा ढांचा जो मृदा सतह से ऊपर चलने में प्रयुक्त होता है) का  नव निर्माण कर उन संक्रमणकारी जीवों से बचाव का साधन की खोज की। “डिटोंग” गेंड़ी पर चलना पूर्वजों की देन है।

आधुनिक सभ्यता को एंटीबायोटिक की खोज और उपयोग

मूलनिवासी कोइतुर परावैज्ञानिकों की खोज “कोया तकनीकी” अद्भुत है जो बीहड़ वनों में से एंटीबायोटिक्स जैसे कन्दो की पहचान कर सभ्य मानवता की पहचान दी। केऊकंद “कुसरी पंडुम” का अहम हिस्सा है जो “पूना कुसरी” के साथ समाजयस्य स्थापित करके उपयोग किया जाता है। मूलनिवासी कोयतोरीन्स को इसके राइज़ोम (कन्द) का उपयोग कर बुखार,  दांत,  एंटी-एजिंग थेरेपी,  पाचन विकार,  खांसी,  ठंड,  अस्थमा,  एनोरेक्सिया,  पेट दर्द, पीठ दर्द,  हृदय का जलना,  अपचन,  गैस्ट्र्रिटिस, पीलिया,  एनीमिया,  मूत्र पथ विकार,  गठिया,  ब्रोंकाइटिस और आंतों के कीड़े के इलाज, तथा एंटीबैक्टीरियल,  एंटीफंगल,  होता है। ऐसे सहमिश्रण को एंटीडोज के रूप में पशु व मानव समाज को दिया जाता है जो हेल्थ और शरीर को मजबूती प्रदान करता है तथा अनेकों बीमारियों का अचूक इलाज है।

मूलनिवासी हरेली स्वास्थ्य टीकाकरण का महाअभियान

ऐसा माना जाता है कि हरेली के दिन प्राकृतिक दैवीय अज्ञात कष्टदायक,  पीड़ादायक बुरी शक्तियां प्रबल होतीं हैं। जिसका निराकरण कुछ विशेष जड़ी-बूटियों और कर्मकांड से संभव है। उसी से बचने के लिए वो वनौषधी लाई जाती है। जिसे सिर्फ चरवाहे यानी गांव के यादव (राउत) जो मूलत: गांव में मवेशियों को चराते हैं। उपवास रखकर साल में एक ही बार फिर वनौषधी को पूरी रात जागकर चरवाहे निगरानी करते हुए वनौषधि को तैयार करते हैं।  डॉनरेश साहू के अनुसार “आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति  के अनुसार मौसम में बदलाव के साथ ऋतु चक्र में वर्षा का समय श्रावण मास में आता है। जुलाई में मानसूनी बारिश सर्वाधिक होती है। इससे कई जगह नदी,  नालों व खेत खलिहानों में बाढ़ का पानी भी आता है। इसके कारण जीवाणु, विषाणु, बैक्टिरिया सक्रिय हो जाते हैं। कहीं-कहीं गंदगी के साथ बाढ़ में पानी जमा हो जाता है, जिससे वायरस के संक्रमण से महामारी फैलने का खतरा बढ जाता है। इससे बचाव के लिए शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाने लोग चिकित्सक से मिलते हैं। मानसून में स्वास्थ्य विभाग द्वारा डायरिया नियंत्रण, शिशु संरक्षण, टीकाकरण,  मलेरिया व डेंगू से बचाव के लिए अभियान चलाया जाता है” ।

वनौषधि सतावर देता है रोग प्रतिरोधक क्षमता

“कोया पुनेम”(“ हरेली पंडुम”तिहार) के साथ खेतिहर फसलों की देखरेख,  नियंत्रण व संरक्षण के लिए कोयतोरीन्स मूलनिवासी तकनीकी में विभिन्न वनस्पतियों का (एंटीबायोटिक्स सोल्यूशन) सक्षम सहमिश्रण का उपयोग जो फंगस बैक्टेरियाओं के सक्रियता (एक्टिविटी) से दूर रखता है। मिश्रण का पहला अंश छेदावरि (सतावरी) जोकि अनेको औषधीय गुणों से परिपूर्ण होता है। गरियाबंद जिले के छुरा ब्लॉक निवासी ग्राम कनसिंघी के बीएएमएस की शिक्षा ले चुके आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. गुलशन कुमार सिन्हा के अनुसार ” हरेली पर्व में जिस जड़ी बूटी का सेवन किया जाता है। उसे आयुर्वेद चिकित्सा पद्वति के शास्त्रों में वनौषधि को सतावर कहते हैं। जिसका लैटिन नाम एस्पेरेगस रेसिमोसस कहा जाता है”। डॉ. सिंहा कहते हैं कि इसे हम स्वास्थ्य कार्यक्रम टीकाकरण मान सकते हैं। जिसमें एक ही दिन में हजारों ग्रामीणों को औषधी खिलाई जाती थी। उन्होंने बताया कि शतावरी एक बहुमुल्य औषधी है।

शतावर के फायदे

मूलनिवासी परंपरा एवं आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सकों एवं पुस्तकों के अनुसार निम्नलिखित लाभ है।

  • प्राचीन काल से ही, छेदावरी (सतावरी) एक कामोद्दीपक के रूप में प्रसिद्ध रहा है।
  • इससे मूत्र प्रवाह,  ब्लड प्रेसर व गुर्दे को साफ करने और गुर्दे की पथरी को रोकने के लिए उपयोग होता रहा है
  • एंटीऑक्सिडेंट (ग्लूटाथियोन त्वचा को अल्ट्रावॉयलेट किरणों की क्षति और प्रदूषण से बचाने में सहायक होता है।)इस जड़ी-बूटी का उपयोग किया जाता है ।
  • छेदावरि का उपयोग तंत्रिका संबंधित समस्याओं,  खांसी और दस्त के इलाज के लिए भी किया जाता है।
  • छेदावरि एक स्वस्थ पोषक तत्व समृद्ध वनस्पति है, जिसमें वसा और कोलेस्ट्रॉल सामग्री नहीं होती है। –इसमें बहुत कम कैलोरी और सोडियम उपस्थित होती हैं।
  • इसमें विटामिन ए,  सी,  ई,  के,  बी 6,  फोलेट (फोलेट गर्भावस्था में भ्रूणों में तंत्रिका-ट्यूब दोषों के जोखिम को कम करता है)।
  • आयरन,  तांबे,  कैल्शियम,  प्रोटीन,  सल्फोराफेन (सल्फोराफेन कैंसर को रोकने में मदद करता है।)
  • अमीनो_एसिड (अमीनो एसिड मानव दिमाग के हॉगओवर को कम करता है।)
  • यह शारिरीक क्षीणता कमजोरी दुर करता है।
  • अनिद्रा दुर करता है।
  • रात की रतौंधी में उपयोगी।
  • पेशाब संबंधी बीमारी जलन रुक रुक कर पेशाब आना ।
  • महिलाओं की स्तन संबंधी समस्या दुध न आना।
  •  पुरुषों में बलवर्धक,  वीर्यवर्धक ।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
  • यह पौष्टिक औषधि है।
मूलनिवासी द्वारा टिटनेस की खोज

कुसरी पंडुम के माध्यम से मूलनिवासी परावैज्ञानिकों ने पुनेमि “मड़ा” कोहका को संरक्षित किया।  “कोहका” की आवश्यकता के अनुसार,  कोयतोरीन्स के कृषि कार्यों और शिकारों में होने वाले चोट के “इन्फेक्शन व वर्षाग्मन के उपरान्त होने वाले बीमारियों और महामारियों को नियंत्रण करने के लिए परावैज्ञानिकों ने “हरेली पंडुम” जैसे “महापर्व” में कोहका के उपयोगिता को निहित किए। जिसकी पत्ती,  तना और फल में कीटनाशकीय (पेस्टिसाइड) गुण होता है,  इसलिए कोयतोरीन्स “हरेली पंडुम” के दिन कोहका के पत्ती ओर छेदावरि  (सतावरी) को तुमरीलाटी (तेंदू लकड़ी) से बांधकर खेतों के बीच लटका देते हैं जो फसलों को कीट व्याधियों से दूर रखता है।

रशना जड़ी बूटियों का प्रजनन में उपयोग

मूलनिवासी रहस्यमई जड़ी जो कोयतोरिन्स तकीनीकी में हर्बल है जो कोयतोरीन्स व कृषितपशुओं के “प्रजजन” क्षमता को विकसित करता है तथा उनके “ओवरी” (गर्भाशय) को अन्य हार्मोन्स से सुरक्षा प्रदान करता है। जिसको परावैज्ञानिक पूर्वजो ने भावी पीढ़ी की सुरक्षा हेतु इकोनॉमिक, सोशियल तथा इन्वरोंमेंटल इकोसिस्टम्स को ध्यान में रखते हुए रहस्यमई वनस्पतियों को भावी पीढ़ी के लिए “परम्परा” और प्रचलन में निहित कर दिए। जिसको हम आज सतत “पंडुम” (त्यौहार) के रूप में मनाते आ रहे है। हमारे पूर्वजों ने इन विभिन्न वनस्पतियों के अलावा पोडारकन्द (वनस्पति)तथा गोम (जीव) के सान्द्रता को पशुओं को एंटीबायोटिक के रूप में दिया जाता है जिससे उनकी स्वास्थ सुधार तथा सुदृढ़ शरीर का निर्माण हो ।

निष्कर्ष

इस प्रकार हम देखते हैं कि मूलनिवासी श्रमण परंपरा मूलतः प्रकृति पर आधारित थी और आज आधुनिक काल में भी पंडुम (प्राकृतिक पर्व),  त्यौहार उत्सव के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी संचालित हो रही है। आज के युग में भी हम देखते हैं कि गांव में एक बैगा (भगत ओझा) होता है जो उस दिन गांव के सभी घरों में जाकर नीम और भल्लातक की टहनियां पत्तों के साथ घर के प्रमुख द्वार और आंगन में लगाता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में नीम और भल्लातक का बड़ा ही औषधी महत्व है। हरेली एक त्यौहार ही नहीं ये हमारे पूर्वजों द्वारा शुरु किया गया पहला स्वास्थ्य अभियान या कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य रोगमुक्त,  स्वस्थ्य शरीर,  निरोगी मन सहित रोग से दूर रखना है।

अब नव युग की गंगोत्री से वही ज्ञान की धारा है।

मूलनिवासी संस्कृति का जीर्णोद्धार करेंगे यह संकल्प हमारा है।।

सन्दर्भ- 1. तुलसी नेताम [कोयतोरीन्स तकीनीकी, कोया पुनेम और गोटुल एडुकेशन सिस्टम!!,  (KBKS.U.B.KANKER)]

  1. डॉ राजेश साहू का लेख
  2. डॉ सूर्यबाली का कोया पुनेमि प्रसंग
©भोला चौधरी, रायपुर छत्तीसगढ़ 

परिचय :– GOLD  MEDALIST, UGC ( NET) उतीर्ण हैं।SECR जोन के रायपुर   मंडल में  मेकैनिकल विभाग में कार्यरत हैं।  स्वतन्त्र लेखक व शोधकर्ता हैं। पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर, UGC (NET) । भारत में ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातियों के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक अधिकार के मुद्दों पर रिसर्च आधारित लेखन में सक्रिय, मूलनिवासी श्रमण संस्कृति, जातिप्रथा के उन्मूलन, नवयान बौद्ध धर्म व बहुजन समाज की मुक्ति  एवं शसक्तिकररण से जुड़े अन्य मुद्दों पर लिख रहे हैं।

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