मेरी रचना

हमारे पूर्वज …

©राजकुमार बोहत, हरियाणा

 

कितने

तड़पाये

कितने

रुलाये

होंगे

इन्होंने

हमारे

पूर्वज

जब वो

आ जाते

गांव

की तरफ

जब

बारिश में

गलती से

घुस जाते

इनके

मंदिर में

कितने

जुल्म

ढहाते थे

जब

पड़ जाती

परछाई

इन पर

कोड़े

मारते

गर्म कांच

कान में

डालते

जीभ

काट देते

इतना

जुल्म

और

आज

इनके

बनाये

मंदिर में

तुम

जाकर

सिर

रगड़ते हो

तुम

जैसा

कायर

मैं

किसी को

नहीं

मानता …

 

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