छत्तीसगढ़

जशपुर / फरसाबहार के विकास की तस्वीर : बीमार को अस्पताल पहुंचाने ग्रामीणों ने 2 किलोमीटर पैदल तय किया कच्चा रास्ता …

जशपुर / फरसाबहारछत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब पांच सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित जशपुर का एक गांव फरसाबहार। यहां जीवन जितना कठिन है, उतनी ही जीवटता यहां रहने वाले आदिवासियों में है। यहां हाथी और मानव द्वंद होना आम है। नागलोक के नाम से विख्यात इस जगह पर सर्पदंश से सर्वाधिक मौतें होतीं हैं। मानव तस्करी के सर्वाधिक मामले जिले में सामने आते रहते हैं। नागलोक के नाम से प्रसिद्ध फरसाबहार विकासखंड मुख्यालय का ग्राम पंचायत फरसाबहार जो आज भी मूलभूत सुविधाओं और विकास से कोसों दूर है। तहसील एवं जनपद पंचायत कार्यालय से मात्र 3 से 4 किलोमीटर पर बसा ग्राम पंचायत फरसाबहार का एक वार्ड बरसात के दिनों में पहुंचविहीन हो जाता है। यदि यहां कोई बीमार पड़ जाए तो उसे तामामुण्डा मिशन के गेट तक लगभग 2 किलोमीटर झेलगी (खाटिया को रस्सियों के सहारे बांधकर बनाया गया डोला, जैसा तस्वीर में दिखाई दे रहा है) में ढोकर लाते हैं।

आदिवासी बाहूल्य इस जिले में ‘विकास’ अब भी नहीं पहुंचा, लेकिन यहां रहने वाले भोले-भाले आदिवासियों में जीवन जीने की ललक गजब की है। वे नंगे पांव मीलों का सफर कर चले आते हैं ‘विकास’ की ओर। जहां अस्पताल है, स्कूल है, कॉलेज और कारखाने हैं। यहां स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। सड़कें नहीं हैं, लेकिन इनमें जीवन जीने की गजब की ललक है। शहर की ओर जाने वाला मार्ग बारिश आते-आते नदी में परिवर्तित हो जाता है। बावजूद इसके वे जानते हैं बीमार होने, सर्पदंश होने पर अस्पताल जाना है। इसी के चलते वे निकल पड़ते हैं अस्पताल की ओर। ऐसा ही वाकया रविवार 26 जुलाई 2020 को सामने आया। जब एक बीमार को अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई सरकारी सुविधा एम्बुलेंस या वाहन नहीं मिला तो यहां के बाशिंदे ‘झेलगी’ में मरीज को रखकर पैदल 2 किलोमीटर सड़क नापते जा पहुंचे अस्पताल।

विकास के बड़े-बड़े दावों की पोल खोलता नागलोक के नाम से प्रसिद्ध फरसाबहार विकासखंड मुख्यालय का ग्राम पंचायत फरसाबहार जो आज भी मूलभूत सुविधाओं और विकास से कोसों दूर है। तहसील एवं जनपद पंचायत कार्यालय से मात्र 3 से 4 किलोमीटर पर बसा ग्राम पंचायत फरसाबहार का एक वार्ड बरसात के दिनों में पहुंचविहीन हो जाता है। यहां हाथी, भालू, सर्प का डेरा है। आए दिन हाथी इनकी फसलों को नष्ट कर देते हैं। घरों में घुसकर रखा अनाज खा जाते हैं, हाथी अपने विशालकाय पैरों तले कुचलकर लोगों को मार रहें हैं। सर्प इतने अधिक कि इस जगह का नाम पड़ गया ‘नागलोक’।

बरसात के दिनों में इस बस्ती से अगर कोई बीमार, प्राकृतिक आपदा से पीड़ित या गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाना हो तो इस बस्ती तक कोई वाहन या एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाता। ऐसे में गांव के लोग खटिया का सहारा लेते हैं और तामामुण्डा मिशन के गेट तक लगभग 2 किलोमीटर खटिया में ढोकर लाते हैं। कभी-कभी तो सड़क तक लाते लाते पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। जिले कई ऐसे गांव हैं जहां पानी, सड़क और चिकित्सा जैसी सुविधा कोसों दूर है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close