मेरी रचना

मल-मूत्र उठाना समाज पर घृणा का ठप्पा : अनिल बिड़लान

युवा कवि नरेंद्र वाल्मीकि के द्वारा संपादित काव्य-संग्रह “कब तक मारे जाओगे” मुझे प्राप्त हुआ। जिसे पढ़कर यह एहसास हो गया कि मेरा परिचय युवा कवि नरेंद्र वाल्मीकि से बेशक कुछ दिन पहले ही हुआ हो परंतु साहित्य के प्रति उनकी सूझबूझ और उनके प्रभावशाली कार्यशैली देखकर लगता है कि वह दलित साहित्य के और दलित समाज के एक प्रखरयोद्धा हैं, जिस प्रकार से इन्होंने सफाई कर्मियों की दयनीय हालात को कलमबंद करते हुए मैला उठाने के इस घृणित पेशे को छोड़कर रोजगार का अन्य विकल्प तलाश करने का अनुरोध किया गया है।

जिसमें दलित साहित्य के कवि डॉ. सुशीला टांकभौरे, सूरजपाल चौहान, डॉ. सुधीर सागर, डॉ. पूनम तुषामड़, डॉ. महेंद्र सिंह बेनीवाल व स्व. ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ नए रचनाकारों डॉ. सुशील कुमार लोहट, अमित मेघनाद, दीपमाला, सूरज कुमार बौद्ध आदि को अपने काव्य संग्रह में स्थान दिया हैं। डॉ. सुशीला टांकभौरे की कविता “मेरा अस्तित्व” की ये पंक्तियां :-

 

मेरी जात-जमात तो यह है

मैं चाहे कितनी ही

ऊंचाई पर पहुंच जाऊं,

पांव उसी जमीन पर है

जहां मेरी बिरादरी है।

 

इन पंक्तियों में कवित्री ने समाज के उन लोगों को आईना दिखाया है, जो पढ़-लिखकर या ऊंचे पदों पर पहुंचकर समाज को भूल जाते हैं अथवा समाज से दूर हो जाते हैं और सोचते हैं कि वह समाज की सीमाओं को लांघ चुके हैं। परंतु वे यह भूल जाते हैं कि जब तक संपूर्ण समाज का विकास नहीं होगा तब तक दूसरे समाज वाले भी तुम्हें अपने समाज में स्वीकार नहीं करते और तुम्हें हमेशा हेय की दृष्टि से देखा जाएगा। डॉ. पूनम तुषामड़ की कविता “स्वाभिमान” हमें सीख देती हैं कि हम घृणित पेशे को छोड़कर, ऐसे पेशे या रोजगार अपनाएं जिनमें मान सम्मान, पहचान और स्वाभिमान से जीवन सके।

इसी प्रकार से डॉ. सुरेखा की कविता “हालात” समाज के भीतर की बुराइयों को दर्शाती है कि किस प्रकार से हम शिक्षा में पिछड़े हुए हैं।

रोज देख रही हूं

बच्चों को शिक्षा से चुराते

स्कूल छोड़ गलियों में

खाली डंडे बजाते हैं

 

इस कविता के माध्यम से हम समाज के अन्दर झांक कर देख सकते हैं कि समाज में कितनी बुराईयां व्याप्त है। हमें बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर की शिक्षाओं को अपनाकर अपने समाज की बुराइयों को समाप्त करना होगा।

हमें मिला ही क्या है ? इस घृणित पेशे से जिसे हम सदियों से ढोते आ रहे हैं। जिन लोगों को यह लगता है कि पैसे कमाने का सिर्फ यही जरिया है तो उन लोगों यह काव्य संग्रह पढ़कर पता चल जाएगा इस पेशे में कितना पैसा है।

डॉ. सुशील कुमार लोहट की कविता “सफाई कामगार की व्यथा” में सफाई कर्मचारी की मुश्किलों का बखान किया गया है जिसकी कुछ पंक्तियां है:-

 

चंद पैसे मिलते हैं मुझे रोजगार के

बहुत मुश्किल से खर्चे चलते हैं मेरे परिवार के

कब बढ़ेगी पगार मेरी

यह तय करेगा कब तक ठेकेदार

मैं हूं सफाई कामगार।

 

जाति व्यवस्था के घिनौने रूप को ढोने वाले समुदाय पर केंद्रित यह संकलन मील का पत्थर साबित होगा और समाज की सोच को बदलने में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करेगा। काव्य संग्रह को पढ़कर पता चलेगा कि समाज कितना नारकीय जीवन रहा है और फिर भी इस घृणित पेशे से हमारे समाज का मोह भंग नहीं हो रहा। हमें तलाश करनी होगी समाज को बदलने के लिए नए-नए विकल्पों और नए-नए रोजगारों की। जिनकी सहायता से हमारा सामाजिक जीवन विकसित हो और हम इस नारकीय जीवन से छुटकारा पा सके। युवा कवि नरेंद्र वाल्मीकि को समाज को सुधारने के लिए अथवा उसे आईना दिखाने के लिए जो ये काव्य-संग्रह पेश किया है उसके लिए इनको बहुत-बहुत धन्यवाद और स्वागत है इनके इस सराहनीय पहल के लिए।

पुस्तक : कब तक मारे जाओगे (जाति-व्यवस्था के घिनौने रूप को ढोने वाले समुदाय पर केन्द्रित काव्य-संकलन)

संपादक : नरेन्द्र वाल्मीकि

पृष्ठ संख्या : 240

मूल्य : ₹120

प्राकाशक : सिद्धार्थ बुक्स (गौतम बुक सेंटर), दिल्ली।

समीक्षक

अनिल बिड़लान, कुरुक्षेत्र, (हरियाणा)

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