छत्तीसगढ़

तितलियों की दुर्लभ प्रजाति व भारत में दूसरे नंबर की आकार में सबसे बड़ी तितली भोरमदेव अभयारण्य में मिली | news-forum.in

कवर्धा | छत्तीसगढ़ की मैकल पर्वत माला श्रृंखला का भोरमदेव वन्य प्राणी अभयारण्य अब तितलियों की विभिन्न दुर्लभ और विलुप्त प्रजातियों के बसेरा के लिए भारतभर में मशहूर हो रहा है। इस अभयारण्य में खोज के दौरान भारत में विलुप्त हो रही तितलियों की दुर्लभ प्रजाति स्पॉटेड एंगल को भी देखा गया। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के बाद भोरमदेव अभयारण्य में देखी गई तितलियों की यह दुर्लभ प्रजातियां बस्तर में रिकॉर्डेड एंगल पेरोट तथा ओरिएंटल चेस्टनट एंगल तितलियों को देखा गया है। भारत की दूसरे नंबर की आकार में सबसे बड़ी तितली ब्लू मॉर्मोन को भी भोरमदेव वन्य प्राणी अभयारण्य में पाया गया।

 

वर्षा ऋतु के बाद अभयारण्य में शुरू होने वाले कार्यों के स्थल निरीक्षण में भ्रमण के दौरान वन मंडल अधिकारी दिलराज प्रभाकर, अधीक्षक मनोज कुमार शाह, परिक्षेत्र अधिकारी चिल्फी देवेंद्र गोंड, पर्यटन, पर्यावरण तथा वन्य प्राणी के व्यवहार में अध्ययन के साथ-साथ वन्य प्राणी रैस्क्यू में विशेष रुचि रखने वाले गौरव निल्हनी तथा वन्य प्राणी पशु चिकित्सक डॉक्टर सोनम मिश्रा एवं अन्य वन अधिकारियों की टीम ने तितली की दुर्लभ प्रजाति स्पॉटेड एंगल की खोज की है।

 

90 से अधिक प्रजातियों का बसेरा

मैकल पर्वत श्रंखला के मध्य 352 वर्ग किलोमीटर में फैले भोरमदेव वन्य प्राणी अभयारण्य अनेक वन्यजीवों, पक्षियों, सरीसृपों तथा दुर्लभ वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास है जो कि अभयारण्य में एक समृद्ध जैव विविधता का निर्माण करते हैं। अभयारण्य में लगभग 90 से अधिक प्रजाति की तितलियों को देखा जा सकता है। इनमें से ओरिएंटल चेस्टनट एंजल, एंगेल्ड पैरोट, कॉमन गल, कॉमन मॉर्मोन, चॉकलेट पेंसी, स्टाफ सार्जेंट, स्पॉटेड एंगल, कॉमन कैस्टर, कॉमन लेपर्ड, कॉमन वंडर्र, कॉमन जे, ब्लू मार्मोन, डेंगी बुश ब्राउन, ग्रेप पेनसी प्रमुख हैं।

 

विश्व में 2 लाख 50 हजार से अधिक प्रजातियां

तितलियां पृथ्वी की जैव विविधता की सबसे विशिष्ट प्रजातियों में से एक हैं। माना जाता है कि इनका अस्तित्व पृथ्वी पर लगभग 5 करोड वर्ष पहले से या उससे भी पहले से है। विश्व में तितलियों और पतंगों की लगभग 2 लाख 50 हजार से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं जो कि अब तक की ज्ञात प्रजातियों में से एक चौथाई के बराबर है। तितलियों के अति संवेदनशील गुणों के कारण इन्हें जैवविविधता परिवर्तन सूचक के नाम से भी जाना जाता है। वातावरण में छोटे से छोटे बदलाव के प्रति भी तितलियां बेहद ही संवेदनशील होती हैं। वातावरण में तापमान, आर्द्रता, प्रकाश और वर्षा के प्रकार में किसी भी परिवर्तन का सबसे पहला असर तितलियों पर पड़ता है जिससे तितलियों के प्राकृतिक आवास, इनके सहवास, प्रजनन तथा प्रजनन क्षमता में और आवास की विविधता तथा गुणवत्ता में पर्यावरण का सीधा फर्क पड़ता है।

 

परागण पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण अंग

तितलियां पारिस्थितिक तंत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उदाहरण के तौर पर वह एक परागणक के रूप में और अन्य प्रजातियों के लिए एक खाद्य स्रोत के रूप में कार्य करती हैं। एक संपन्न पारिस्थितिकी तंत्र जाल में तितलियों की भूमिका एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में होती है। परागण पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण अंग है जो तितलियों के सहयोग से किया जाता है। लगभग 90 प्रतिशत फूलों के पौधे और 35 प्रतिशत फसलें, पशु परागण पर निर्भर करती हैं।

 

जीवन एवं भविष्य को सुरक्षित किया जा सकेगा

इनके द्वारा मधुमक्खियों, मक्खियों और भृंग जैसे परागणकों को भी संवर्धन एवं विकास का अवसर मिलता है। तितलियों के प्राकृतिक पर्यावासों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया गया है और अब जलवायु तथा मौसम के बदलते स्वरूप तथा वायुमंडल के बढ़ते प्रदूषण के फलस्वरुप इन खूबसूरत प्राणियों का विलुप्त होना सबके लिए बेहद चिंताजनक एवं नुकसान नुकसानदेह है। तितलियों के संरक्षण से वन्य जीवन के समस्त वातावरण में सुधार होगा और लोगों के जीवन एवं भविष्य को सुरक्षित किया जा सकेगा।

 

तितलियां विलुप्त हो गईं तो क्या होगा

तितलियों के बिना चॉकलेट, सेब, कॉफी और अन्य खाद्य पदार्थों का आनंद हम नहीं ले सकेंगे और हमारे दैनिक अस्तित्व में जिसका महत्वपूर्ण असर पड़ेगा क्योंकि दुनिया भर में लगभग 75 प्रतिशत खाद्य फसलें इन परागणकर्ताओं पर निर्भर करती हैं।

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