मेरी रचना

कहीं प्रथा न बन जाए …

©डॉ. संतराम आर्य

 

मेरा बाप मरा सीवर के अंदर

मैं भी मर जाऊंगा

डर तो है इस बात का बेटे

मैं प्रथा बन जाऊंगा – मेरा बाप…

कुछ भी करके पेट पालना

चाहे मजदूरी कर लेना

मैला ढोने जैसी शिक्षा

कभी किसी को नहीं देना

मैंने ठानी है तुम्हें पढ़ाना

तुम मेहनत से पढ़ना

मेरी चिंता मत करना

सपने साकार कराऊंगा – मेरा बाप…

मैले से संस्कार हो मैले

विचार मैल में धंस जाएं

लिखना-पढ़ना याद रहे ना

जीवन भर पछताए

विद्या से भरपूर आदमी

जग में नाम कमाए

अच्छी शिक्षा दे कर तुमको

ज्ञान सम्मान दिलाऊंगा- मेरा बाप…

मेरी बात ध्यान में धर के

सबको यही समझाना है

दुनिया दौड़े है तेजी से

हमें भी आगे जाना है

पीना-पिलाना, झगड़ा करना

विनाश की राह पर जाना है

तुम्हारे लिए संकल्प लिया है

इस जाति का कलंक मिटाऊंगा- मेरा बाप…

बस थोड़े दिनों की बात है पापा !

बच्चे हमें समझाते हैं

प्रथा हम नहीं बनने देंगे

स्कूल इसीलिए जाते हैं

बहन-भाई हम दोनों अव्वल

कक्षा में नम्बर लाते हैं

मैं सुन कर गद-गद होता हूं

क्या ऐसा कर पाउंगा- मेरा बाप …


परिचय :  जन्म 14 फरवरी, 1938, रोहतक.

प्रकाशित कृतियां : शांति, अमन के रास्ते, उजाले की राह (उपन्यास), दर्द की भाषा (कविता संग्रह), उधार की जिंदगी (कहानी संग्रह), ईश्वर से मुलाकात (व्यंग्य), मेरा अतीत (आत्मकथा).

सम्मान : डॉ. आम्बेडकर साहित्य सम्मान, साहित्य अकादमी उज्जैन, साहित्य संगम उदयपुर. ‘अक्षरादित्य’ मानद सम्मानोपाधि

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