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आदिवासी किसान ने ग्लूकोज की बोतल का ऐसा किया इस्तेमाल, बूंद-बूंद सिंचाई से कमा रहा लाखों …

नई दिल्ली। भारत में कुछ स्थानों पर पानी की बहूलता है तो कुछेक स्थानों पर वर्षा जल पर खेती-किसानी निर्भर रहती है। ऐसे समय में यदि वर्षा ठीक ढंग से नहीं हुई तो खेती बर्बाद और कर्ज अलग से। ऊपर से पहाड़ी क्षेत्रों में खेती करना तो और भी मुश्किल। इस समस्या से निजात पाने के लिए देसी जुगाड़ ने बड़ा कमाल दिखाया। मध्य प्रदेश के रहने वाले एक आदिवासी किसान रमेश बारिया ने ऐसा ही कुछ करके दिखाया है। पहाड़ी आदिवासी क्षेत्रों में खेती करना मुश्किल है, यहां सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता था लेकिन एक किसान ने इस समस्या से निपटने के लिए वेस्ट पड़ी ग्लूकोज बोतल के साथ जो जुगाड़ लगाया उससे अब वह लाखों रुपए की कमाई कर रहा है।

ग्लूकोज बोतल से कमा रहा लाखो

भारत में किसानों को सिंचाई के लिए अभी भी पानी की कमी का समस्या का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर जगहों पर बारिश कम होना आम बात है। इससे निपटने के लिए कुछ किसान आज भी पुरानी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे उन्हें मेहनत का पूरा फल भी नहीं मिल पाता। ऐसे में मध्य प्रदेश के एक किसान का ड्रिप सिस्टम खेती का आइडिया वायरल हो गया है।

बारिश पर रहना पड़ता था निर्भर

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले झाबुआ में पहाड़ी आदिवासी क्षेत्र में खेती करना किसानों के लिए चुनौती भरा काम है। यहां किसानों को खेत की सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर रहना पड़ता था, इसके चलते किसानों के मेहनत के बराबर भी फसल नहीं मिल पाती थी। इस बीच रमेश बारिया नाम के एक आदिवासी किसान ले इन चुनौतियों से निपटने के लिए अब बेहतरीन जुगाड़ निकाला लिया है।

एनएआईपी के विशेषज्ञों से ली मदद

आदिवासी किसान रमेश बारिया ने अपनी फसल और आय बढ़ाने के लिए साल 2009-10 में राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना (NAIP) के वैज्ञानिकों से संपर्क किया और उनसे खेती के गुर सीखे। आदिवासी किसान रमेश बारिया ने विशेषज्ञों के निर्देश पर सर्दी और बरसात के मौसम में उगाए जाने वाले सब्जियों की खेती एक छोटे से जमीन के टुकड़े पर शुरू की। ये खेती पहाड़ी आदिवासी क्षेत्र की जमीनों के लिए बिल्कुल उचित थी।

सिंचाई के लिए पानी की थी समस्या

आदिवासी किसान रमेश बारिया ने अपनी जमीन पर करेला, स्पंज लौकी उगाना शुरू किया, इसके बाद जल्द ही उन्होंने एक छोटी नर्सरी स्थापित की लेकिन शुरुआत में उन्हें मानसून में देरी के चलते सिंचाई के लिए पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ता था। रमेश बारिया को लगा ऐसे में फसल खराब हो सकती है, जिसके बाद उन्होंने NAIP की मदद ली। यहां विशेषज्ञों ने उन्हें वेस्ट ग्लूकोज की पानी की बोतलों की मदद से खेत की सिंचाई करने का सुझाव दिया।

20 रुपए किलो की दर से खरीदी बोतल

आदिवासी किसान रमेश बारिया ने 20 रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से वेस्ट ग्लूकोज की बोतल खरीदी। रमेश ने सभी बोतलों के ऊपरी हिस्से को काट दिया, जिससे उनमें पानी भरा जा सके, इसके बाद उन्होंने इसे डंडों के सहारे पौधों के पास लटका दिया। उन्होंने इन बोतलों से बूंद-बूंद का एक स्थिर पानी का प्रवाह बनाया। रमेश ने बोतलों को पानी से भरने के लिए अपने बच्चों को काम पर लगाया जो रोज सुबह स्कूल जाने से पहले इसे भरकर जाते हैं।

हर महीने 15 हजार से अधिक की कमाई

इस तकनीक के बाद से रमेश बारिया की कमाई में इजाफा हुआ और वह 0.1-हेक्टेयर भूमि से 15,200 रुपये का लाभ अर्जित करने में सफल रहे। यह तकनीक न केवल सिंचाई के लिए बेहतर थी बल्कि इससे पौधों को सूखने से बचाया भी जा सकता है। इसके अलावा इससे पानी की बर्बादी भी नहीं होती है और इसमें लागत भी कम है।

मध्य प्रदेश सरकार ने किया सम्मानित

साथ ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले उन प्लास्टिक बोतलों का भी सही इस्तेमाल होता है जिसे मेडिकल कचरे में फेंक दिया जाता है। आदिवासी किसान रमेश बारिया को देखकर अब उनकी इस तकनीक को गांव के अन्य किसानों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है। इस कार्य के लिए आदिवासी किसान रमेश बारिया को जिला प्रशासन और मध्य प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री की सराहना के प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया है।

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