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विकास दुबे का बेटा बन रहा डॉक्टर, जब एक दुर्दांत डकैत का बेटा बना था दारोगा …

नई दिल्ली। बुरे आदमी की संतान भी बुरी हो ऐसा ज्यादातर देखने को तो मिलता है लेकिन कुछेक मामलों में बदमाश की औलाद भी अच्छी हो सकती है। यहां बात कर रहे हैं उन गैंगस्टर्स की जो जुर्म के रास्ते पर चले लेकिन वे कभी नहीं चाहे कि उनके औलाद अपराधी बने। कानपुर का गैंगस्टर 8 पुलिस कर्मियों का हत्यारा व दुर्दांत अपराधी विकास दुबे का बेटा अब डॉक्टर बनने वाला है। इसी तरह यूपी के एक इनामी डाकू का बेटा दरोगा बना था। आदमी कितना भी बुरा क्यों न हो वह अपने बेटे को अच्छा इनसान बनाना चाहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह जानता है कि अपराध की इस दुनिया का एक न एक दिन खौफनाक अंत होना है। 8 पुलिस कर्मियों का हत्यारा विकास दुबे के नाम से पुलिस वाले भी कांपते थे लेकिन जब वक्त आया तो वही विकास दुबे पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। इसी तरह डाकू छविराम भी कभी यूपी में आतंक का पर्याय था। छविराम ने डकैती और खून खराबे से सरकार की नाक पर दम कर दिया था। उस पर सरकार ने एक लाख रुपए का इनाम रखा था। एक दिन उसे भी पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था। बाद में दुर्दांत छविराम के बेटे ने दारोगा बनकर साबित किया कि पिता के अपराध से उसका कुछ लेना-देना नहीं। उसने सम्मान से जीने के लिए खुद रास्ता बनाया।

कौन था छवि राम?

छविराम यादव यूपी के मैनपुरी जिले के औछा गांव का रहने वाला था। 20 साल की उम्र में ही वह डकैत बन गया था। धीरे-धीरे उसका आतंक बढ़ता गया। डकैती और हत्या से उसने उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में दहशत फैला दी थी। उसके खौफ से लोग थऱथर कांपते थे। पुलिस भी उससे टकराने की हिम्मत नहीं करती थी। 1978 के आसपास छविराम आंतक का दूसरा नाम बन चुका था। उसके गिरोह पर एक विधायक की हत्या कर लाश को जमीन में गाड़ देने का आरोप लगा था। उसने खुद को यादव लोगों के मसीहा के रूप में पेश किया। जून 1980 में वीपी सिंह यूपी के मुख्यमंत्री बने। उस समय यूपी में डकैतों का बोलबाला था। दस्यु सुंदरी फुलन देवी 1981 में 20 ठाकुरों की बीच चौराहे हत्या कर चुकी थी। इस बीच छविराम का भी आंतक बढ़ता जा रहा था। तब वीपी सिंह ने यूपी में दस्यु उन्मूलन का एक बड़ा अभियान चलाया था। छविराम को पकड़ने के लिए सरकार ने एक लाख रुपए के इनाम की घोषणा की लेकिन पुलिस उसे पकड़ नहीं पा रही थी। इस बीच 1982 के शुरू में छविराम ने एटा जिले के अलीगंज तहसील के सर्किल ऑफिसर को अगवा कर लिया। उसे शक था कि प्रशासन उसका सुराग पाने के लिए उसके समर्थकों पर जुल्म ढा रहा है। छविराम ने सर्किल ऑफिसर का अपहरण कर एक तरह से सरकार को ही चुनोती दे डाली थी। उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। इस घटना से सरकार की छवि को धक्का लगा। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने छविराम को मार गिराने के लिए वीपी सिंह को मौन सहमति दे दी थी। इंदिरा गांधी के इशारे पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों ने वारंट जारी कर दिया।

मुठभेड़ में मारा गया छविराम

वीपी सिंह ने छविराम को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी तत्कालीन एसपी कर्मवीर सिंह को दी थी। कर्मवीर ने छविराम के गैंग में अपने भेदिये प्लांट किए। उसकी टोह में पुलिस लगी रही। एक दिन खबरी की सूचना पर पुलिस पूरी तैयारी के साथ निकली। मैनपुरी के बरनाहल प्रखंड में सेंगर नदी के पास पुलिस ने छविराम गिरोह को घेर लिया। उस दिन उसके साथ केवल 8 डकैत ही थे। दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। करीब 20 घंटे तक मुठभेड़ हुई। आखिरकार छविराम और उसके 8 साथी डकैत मारे गए। छविराम और अन्य डकैतों के शव मैनपुरी के क्रिश्चियन मैदान में लाकर लकड़ी के तख्तों पर लटका दिए गए ताकि दूसरे डकैत गिरोहों में खौफ पैदा हो सके। सरकार ये संदेश देना चाहती थी कि बुराई का अंत बुरा ही होता है। अपराधी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक न एक दिन उसका खात्मा जरूर होता है।

डकैत छविराम का बेटा बना दारोगा

जब छविराम मुठभेड़ में मारा गया, उस समय उसके छोटे बेटे अजय पाल यादव की उम्र पांच साल थी। इस घटना के बाद छविराम की पत्नी धनदेवी अपने मायके कन्नौज के नगला गांव चली गई। वहीं रह कर उन्होंने अपने तीन बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। छोटे बेटे अजय ने पढ़ाई के बाद साधारण तरीके से जीवन शुरुआत की। 1998 में वह अगरा पुलिस में सिपाही बना। वह सिपाही तो बन गया लेकिन उसके दिल में कुछ बड़ा करने की तमन्ना जोर मारती रही। सिपाही की नौकरी करते हुए उसने पढ़ाई जारी रखी। 2011 उसे विभागीय परीक्षा देकर दारोगा बनने का अवसर मिला। उसने पूरी तैयारी के साथ परीक्षा दी। सफल रहा। ट्रेनिंग पूरा करने के बाद वह 2013 में दारोगा के पद पर बहाल हुआ। एक दुर्दांत डकैत के बेटे ने दारोगा बनकर समाज के सामने एक नयी मिसाल पेश की थी।

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