संपादकीय

स्वदेशी आंदोलन में कौन मजबूत होगा …

                                    ©संजीव खुदशाह, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

भारतीय इतिहास में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत 1872 में मानी जाती है लेकिन ये आंदोलन गांधी के अफ्रीका से भारत आने के बाद सन् 1930 से “विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार” के नारे के साथ जन-जन तक पहुंचा। यह आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। ब्रिटिश सरकार को इस आंदोलन से कई मुश्किलें झेलनी पड़ी थी। आंदोलन का प्रमुख मकसद ब्रिटिश सरकार को आर्थिक हानि पहुंचाना था। स्वतंत्रता मिलने के साथ-साथ यह आंदोलन भी समाप्त हो गया। कई विदेशी कल-कारखानें भारत में खोले गए, काफी मात्रा में विदेशी वस्तुओं के आयात करने की नीति बनाई गई। इससे आज भारत विकासशील देशों की फेहरीस्तस में है। वर्तमान भारत में ऐसा कोई घर नहीं होगा, जहां विदेशी वस्तुएं ना होंगी। मोबाइल से लेकर कपड़े तक, इलेक्ट्रॉनिक चीजें, आपको घरों घर मिलेंगी। जो विदेशी होंगी।

गांधी के स्वदेशी आंदोलन के लगभग 90 साल बाद फिर से स्वदेशी आंदोलन जोर पकड़ रहा है लेकिन दोनों आंदोलनों में बुनियादी फर्क है। यह बताना जरूरी है कि वर्तमान स्वदेशी आंदोलन किसी खास विचारधारा से पोषित है। दोनों आंदोलनों में कुछ खास अंतर भी है। आइए इस पर चर्चा करते हैं।

  1. 1930 का स्वदेशी आंदोलन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ था लेकिन वर्तमान आंदोलन चाइना के खिलाफ है।
  2. 1930 का स्वदेशी आंदोलन देशभक्ति की विचारधारा से प्रेरित था। किंतु वर्तमान आंदोलन राष्ट्रवाद या अतिवाद की भावना से प्रेरित है।
  3. 1930 का स्वदेशी आंदोलन ब्रिटिश सरकार को भगाने के लिए था। वर्तमान आंदोलन खुद की सरकार स्थापित करने या उसे बनाए रखने के लिए है।
  4. 1930 का स्वदेशी आंदोलन शिखर से लेकर जनसामान्य तक स्वप्रेरणा से लागू था लेकिन वर्तमान आंदोलन को चाइना द्वारा बनाई गई पटेल की मूर्ति / चंदे से कोई परहेज नहीं है। केवल जन सामान्य पर लागू है। जनसमान्य से ही कहा जा रहा है कि चाइनीज वस्तुओं का त्याग करें लेकिन शिखर पर बैठा व्यक्ति, ठेके से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं तक कोई परहेज नहीं कर रहा है।
  5. 1930 के स्वदेशी आंदोलन का मकसद घरेलू, गृह उद्योगों को मजबूती प्रदान करना था। चूकि अब गृह उद्योग लगभग समाप्त हो चुका है। वर्तमान आंदोलन कुछेक औद्योगिक घरानों, जातियों को फायदा पहुंचाने के लिए है। जो स्वदेशी के नाम पर धंधा करते हैं। आप समझ सकते हैं कि स्वदेशी आंदोलन वर्तमान में किस विचारधारा से ग्रसित है। ऐसी स्थिति में भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग जो कि उपभोक्ता है। उद्योग-धंधों से महरूम है, के सामने प्रश्न खड़ा होता है कि स्वदेशी आंदोलन को क्यों अपनाए ? यदि अपनाते हैं तो इसका किसे लाभ मिलेगा ?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है।

भारत में जातिप्रथा अपने चरम पर है। जातीय भेदभाव, शोषण बढ़ रहा है। भारत में उद्योग धंधों, उत्पादनो में ऊंची जातियों का कब्जा है। यह जातियां ब्राह्मणवाद, जातिवाद, पूंजीवाद का पोषण करती रही है। या कहे शोषणकारी सिस्टम को बनाए रखना चाहती हैं। ऐसी स्थिति में क्या बहुजन समाज स्वदेशीवाद को बढ़ावा देकर वह इन ऊंची सामंतवादी जातियों को मजबूत करेंगे, ताकि वह उनपर और जातीय दमन, अत्यारचार करे? यानि जैसे-जैसे ये ऊंची जातियां मजबूत होती जाएंगी वैसे-वैसे संख्या बल में बड़ी किन्तु छोटी जातियों का और शोषण करेंगी। स्वदेशीवाद में चुनौतियां और भी हैं जिसका सामना देश की जनता को करना पड़ेगा।

  1. स्वदेशी के नाम पर महंगे वस्तुओं को खरीदने की मजबूरी। इस वाद की सबसे बड़ी समस्या यही है कि स्वदेशी के नाम पर लोगों को ऊंचे दामों में वस्तु खरीदनी पड़ती है। जबकि विदेशी वस्तुएं सस्ती होतीं हैं। अकसर ऐसा होता है कि मुनाफाखोर लोग स्वदेशी के नाम पर वस्तुओं की कीमतें बढ़ाकर बेचते हैं। उनको मालूम है कि भावनाओं में आकर लोग उनकी वस्तुओं को ही खरीदेंगे।
  2. स्वदेशी के नाम पर गुणवत्ता हीन वस्तुओं को खरीदने की मजबूरी। देश में कई ऐसी कंपनियां या ट्रस्ट हैं जिनके उत्पाद गुणवत्ताहीन होने के कारण विदेश में निर्यात की अनुमति नहीं मिल पाती। उनका उत्पाद विदेशों में तो निर्यात नहीं हो पाता लेकिन यही उत्पाद देश में हाथों-हाथ बिक जाता है। इसके पीछे यही स्वदेशी आंदोलन की भावना है। स्वदेशीवाद कुछ और नहीं बल्कि मार्केटिंग टेक्निक का एक हिस्सा है। जिसे राष्ट्रवाद के नाम पर भुनाया जाता है।
  3. स्वदेशी के नाम पर पिछड़ी तकनीक को अपनाने की मजबूरी जातियों पर गर्व करने वाला भारत, अविष्कार और तकनीक में काफी पीछे है। बहुत सारे अविष्कार और तकनीक भारत तक पहुंचने में वक्त लेते हैं। ऐसी स्थिति में विदेशी उत्पाद नई तकनीक के साथ-साथ उपलब्ध हो जाते हैं लेकिन स्वदेशी उत्पाद में नई तकनीक नहीं होने के बावजूद खरीदने की मजबूरी होती है।
  4. स्वदेशी के नाम पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की कमी स्वदेशीवाद में जब विदेशी उत्पादों को दरकिनार कर दिया जाता है तो उसके बाद उत्पादों को लेकर प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है। लोग मुनाफाखोरी, गुणवत्ताहीन महंगी वस्तुएं खरीदने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
  5. कार्यकुशलता के बजाय जातिवाद को बढ़ावा स्वदेशी या निजी उद्योगों में यह देखा गया है कि वह कर्मचारियों की भर्ती से लेकर पदोन्नति एवं लाभांश बंटवारा में भाई-भतीजावाद, जातिवाद का जमकर पालन करते हैं। क्योंकि व्यवसाय पर ऊंची जातियों का कब्जा है। इसलिए कार्य कुशल वंचित जातियों के कर्मचारियों को तवज्जो देने के बजाय अपनी जाति-बिरादरी को प्राथमिकता दी जा‍ती हैं। इससे प्रतिभाओं का जमकर शोषण होता है।

इन सब बातों से यह सिद्ध होता है कि स्वदेशी वाद न केवल देश के लिए अहितकारी है बल्कि वंचित समुदाय के लिए शोषणकारी और ऊंची जातियों के लिए लाभकारी नीति भी है। वैसे भी ग्लोबलाइजेशन के इस युग में स्वदेशीवाद निरर्थक प्रतीत होता है। या जानबूझकर किसी खास तबके को फायदा पहुंचाने का एक हथकंडा प्रतीत होता है। तकनीक एवं अविष्कार की दृष्टि से पिछड़े इस देश को नई नई तकनीक की जरूरत है। वहीं राष्ट्रवाद के नाम पर स्वदेशीवाद की बात करना बेमानी है।


परिचय :- जन्म 12 फरवरी 1973 को बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ। शिक्षा एमए, एलएलबी। आप देश में चोटी के दलित लेखकों में शुमार किए जाते हैं और प्रगतिशील विचारक, कवि, कथाकार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में भी जाने जाते हैं। आपकी रचनाएं देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकीं हैं। “सफाई कामगार समुदाय” एवं “आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग”, “दलित चेतना और कुछ जरुरी सवाल”  आपकी चर्चित कृतियों मे शामिल है। आपकी किताबों का मराठी, पंजाबी, ओडिया सहित अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। आपकी पहचान मिमिक्री कलाकार और नाट्यकर्मी के रूप में भी स्थापित है। छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन से निबंध विधा के लिए पुर्ननवा पुरस्कार सहित आप कई पुरस्‍कार एवं सम्मान से सम्मानित किए जा चुके हैं।)

E-mail- sanjeevkhudshah@gmail.com

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