मेरी रचना

तुम्हारा जुल्म …

©राजकुमार बोहत, हरियाणा

तुम सदियों से मुझ पर

जुल्म करते आये हो

तुम मेरे पहनावे से

चिड़ते हो

तुम मेरे खाने से

चिड़ते हो

तुम मेरे घर से

चिड़ते हो

तुम मेरी गाड़ी से

चिड़ते हो

आखिर तेरा मैंने

बिगाड़ा क्या है

तू भी इंसान

में भी इन्सान

फिर तुझमे मेरे प्रति

इतनी नफरत क्यों है

क्यों करता है इतने

जुल्म मेरे समाज पर

मेरे भाइयों के मर्डर

बहनों के बलात्कार

क्यों करता है

इसलिए कि मै

पढ़ने लगा हूं

मै आवाज़ उठाने

लगा हूं

में अपने अधिकार

मांगने लगा हूं

तेरी बराबरी करने

लगा हूं

या कुछ और बात है ..

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One Comment

  1. राजकुमार जी आपकी कविता सही सवाल करती है।
    इस सोच को बदलने की जरूरत है।

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